Friday, November 27, 2015

वेतन आयोग लाएगा महंगाई


 

कर्मचारियों की सुख समृद्धि बढ़े, उनका जीवन स्तर ऊंचा उठे, इससे इनकार कोई विघ्नसंतोषी ही करेगा। लेकिन सवाल यह है कि जिस देश में 125 करोड़ लोग रह रहे हों और चालीस करोड़ से ज्यादा लोग रोजगार के योग्य हों, वहां सिर्फ 33 लाख एक हजार 536 लोगों की वेतन बढ़ोत्तरी उचित है? सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद केंद्र सरकार की तरफ से अपने कर्मचारियों को लेकर यही आंकड़ा सामने आया है। बेशक सबसे पहले केंद्र सरकार ही अपने कर्मचारियों को वेतन वृद्धि का यह तोहफा देने जा रही है। लेकिन देर-सवेर राज्यों को भी शौक और मजबूरी में अपने कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक वेतन देना ही पड़ेगा। जब यह वेतन वृद्धि लागू की जाएगी, तब अकेले केंद्र सरकार पर ही सिर्फ वेतन के ही मद में एक लाख दो हजार करोड़ सालाना का बोझ बढ़ेगा। इसमें अकेले 28 हजार 450 करोड़ का बोझ सिर्फ रेलवे पर ही पड़ेगा। इस वेतन वृद्धि का दबाव राज्यों और सार्जजनिक निगमों पर कितना पड़ेगा, इसका अंदाजा राज्यों के कर्मचारियों की संख्या के चलते लगाया जा सकता है। साल 2009 के आंकड़ों के मुताबिक, सरकारी क्षेत्र के 8 करोड़ 70 लाख कर्मचारियों में से सिर्फ 33 लाख कर्मचारी केंद्र सरकार के हैं। जाहिर है कि बाकी कर्मचारी राज्यों के हैं या फिर सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों के। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्यों पर कितना बड़ा आर्थिक बोझ आने वाला है।याद कीजिए 2006 को। इसी वर्ष छठवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू की गईं, जिससे केंद्र पर 22 हजार करोड़ रुपए का एक मुश्त बोझ बढ़ा था। केंद्रीय कर्मचारियों की तनख्वाहें अचानक  एक सीमा के पार चली गईं। केंद्र के कुल खर्च का 30 फीसदी अकेले वेतन मद में ही खर्च होने लगा।

इसका दबाव राज्यों पर भी पड़ा। उनका खर्च छठवें वेतन आयोग के चलते 74 फीसदी तक बढ़ गया। कई राज्यों ने तो केंद्र पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया था कि उनके कर्मचारियों को बढ़ा हुआ वेतन देने के लिए केंद्र मदद करे। कई राज्यों की अर्थव्यवस्था तक चरमरा गई। उनके पास विकास मद में खर्च करने के लिए पैसे तक नहीं बचे। 2006 के बाद ही हमें महंगाई में तेजी दिखने लगीं। इसी के बाद पेट्रोलियम की कीमतें आसमान छूने लगीं। उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में भी इजाफा हुआ । यह बात और है कि दो साल बाद आई वैश्विक मंदी और उससे घटी विकास दर के सिर पर महंगाई का ठीकरा सरकार और एक हद तक रिजर्व बैंक ने फोड़ दिया था। इसी दौर में आर्थिक जानकारों का एक तबका ऐसा भी था, जो छठवें वेतन आयोग को भी इस महंगाई से जोड़कर देख रहा था, लेकिन तत्कालीन अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री की अगुआई वाली सरकार और उसके वित्त मंत्रियों ने इसे महंगाई के लिए जिम्मेदार नहीं माना। ठीक नौ साल पहले लागू हुए छठवें वेतन आयोग की रिपोर्ट के बाद आशंकित सामाजिक असमानता और उससे बढ़ने वाली आर्थिक दिक्कतों और महंगाई को लेकर समाजवादी पृष्ठभूमि वाले राजनेताओं, कम्युनिस्ट पार्टी शासित केरल, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल ने इस समस्या की तरफ ध्यान दिलाने की कोशिश की । लेकिन तब की कांग्रेसी सरकार ने इस अनसुना कर दिया। उसका फायदा ठीक तीन साल बाद हुए आम चुनावों में मिला, जब कांग्रेस की सीटें 145 से बढ़कर 206 तक जा पहुंची।
दरअसल जैसे ही वेतन आयोग लागू होता है, उसके हिसाब से बढ़ी सरकारी कर्मचारियों की आय के मुताबिक बाजार अपने आप ही हर चीज की कीमत में इजाफा कर देता है। मौजूदा आर्थिक दर्शन भले ही इसे विकास की अर्थव्यवस्था मानता हो. लेकिन अव्वल कुछ लाख लोगों की बजाय बाकी लोगों की जिंदगी पर भारी दबाव बढ़ जाता है। 2001 के जनगणना के आंकड़ों और हाल के दिनों के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक देश में करीब चालीस करोड़ काम कर रहे हैं। उनमें से सिर्फ 7 फीसदी लोग ही सरकारी या संगठित क्षेत्र में काम कर रहे हैं। बाकी लोग या तो दिहाड़ी या अनियमित या फिर छोटे-मोटे काम करने या फिर असंगठित क्षेत्र में मामूली आमदनी के बदले अपना खून-पसीना बहाने को मजबूर हैं। कहने का मतलब यह है कि जब वेतन आयोग आता है तो उसके जरिए कुछ लाख लोगों की कमाई बढ़ जाती है। उस कमाई के चलते बाजार में नई तरह की तरक्की और तेजी दिखती है। लेकिन इसके असर से सिर्फ वे ही लोग अप्रभावित रहते हैं, जिनकी तनख्वाहें बढ़ जाती हैं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि असंगठित या छोटे-मोटे क्षेत्रों के लोगों की तनख्वाहें नहीं बढ़तीं या सरकारी नौकरियों की बढ़ोत्तरी की तुलना में कम बढ़ती हैं तो उन्हें सस्ती दरों पर बाजार सामान मुहैया कराने लगता है। 2006 में आलू पांच रूपए किलो बिकता था. जो चीन 24 रूपए किलो बिकती थी , जो अरहर की दाल 48 रूपए किलो थी, जो चावल 16 रूपए किलो था, वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू होते ही उनकी कीमतों में लगातार बढ़ोत्तरी होनी शुरू हो गई। लेकिन क्या छठवें वेतन आयोग के मुताबिक बाकी कामगारों की तनख्वाहें बढ़ीं?  छठवें वेतन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक न्यूनतम वेतन 7 हजार है। लेकिन आज भी कितने लोग और कामगार ऐसे हैं, जिन्हें सात हजार रूपए महीने की तनख्वाह मिल पाती है। लेकिन क्या उन्हें चावल, आलू, चीनी या तेल सस्ती कीमतों पर मिल पाता है।
उन लोगों अब जरा वेतन आयोगों के इतिहास व उसके जरिए बढ़ रहे खर्चो पर निगाह डाल लें। पहला वेतन आयोग आजादी से ठीक पहले अंतरिम सरकार ने मई-1946 में गठित किया, जिसे उसी साल लागू कर दिया गया था। दूसरा वेतन आयोग 1957 में बना, जिसकी रिपोर्ट 1959 में लागू की गई। चूंकि वह सस्ती का जमाना था और केंद्र के कर्मचारी भी कम थे, लिहाजा सरकार पर सिर्फ चार करोड़ का ही बोझ बढ़ा। तीसरा वेतन आयोग 1970 में गठित हुआ और उसकी रिपोर्ट 1973 में लागू की गई। इस दौरान सरकार का ढांचा बड़ा हो गया था। अत: उस पर 144 करोड़ सालाना का बोझ बढ़ा। चौथा वेतन आयोग 1986 में गठित हुआ, जिसकी रिपोर्ट उसी साल लागू की गई। यह पहला वेतन आयोग था, जिसके चलते भारत सरकार पर सबसे ज्यादा करीब 13 सौ करोड़ का बोझ बढ़ा। पांचवां आयोग 1996 में गठित किया गया और उसकी रिपोर्ट 1997 में आई व लागू की गई। यह पहला आयोग था, जिसने सरकारी पदों में तीस फीसदी की कटौती की सिफारिश की। हालांकि, करोड़ों का बोझ इसके जरिए भी केंद्र व राज्यों पर बढ़ा। छठवां वेतन आयोग 2006 में गठित हुआ। इसी साल उसने रिपोर्ट भी दी और उसे लागू भी कर दिया गया। इससे सरकार पर 22 हजार करोड़ का बोझ बढ़ा। राज्यों का बजट खर्च तो 74 फीसदी तक बढ़ गया।
ध्यान देने की बात यह है कि अपनी अर्थव्यवस्था फिलहाल हिचकोले खा रही है। 20 वर्षो में पहली बार देश का राजकोषीय घाटा अगस्त तक के आंकड़ों के ही मुताबिक 3.59 फीसदी रहा। यानी, आमदनी से ज्यादा सरकारी खर्च बढ़ गया है। लगातार निर्यात घट रहा है। अरहर की दाल अब तो अपनी पुरानी कीमत 67 रूपए प्रति किलो और सरसों तेल 82 रूपए किलो की दर पर लौटने से रही। हां, सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट के बाद सरकारी कर्मचारियों की तर्ज पर आम कामगारों की कमाई भी बढ़ने से रही। ऐसे में एक महंगाई के लिए हमें और तैयार रहना होगा। इस वेतन वृद्धि से बेशक कुछ लाख लोगों की जिंदगी का स्तर बेहतर हो जाएगा, लेकिन यह भी तय है कि उसके मुकाबले आम लोगों के बड़े हिस्से की जिंदगी कहीं ज्यादा दुश्वार हो जाएगी।

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