Saturday, November 7, 2009

कोड़ा अभी क्यों नजर आ रहे हैं भ्रष्टाचारी



उमेश चतुर्वेदी

झारखंड में जारी चुनावों और पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के खिलाफ छापेमारी के बीच कोई संबंध है...ये सवाल इन दिनों बड़ी शिद्दत से उठ रहा है। सवाल उठने की वजह भी है। झारखंड जैसे छोटे और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर राज्य का पांच साल तक मधु कोड़ा बेरहमी से शोषण करते रहे और अकूत संपति बनाते रहे – इसकी जानकारी आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय और इंटेलिजेंस ब्यूरो को एक दिन में तो मिली नहीं होगी। जाहिर है- इसकी खबर पहले भी अपनी इन दमदार एजेंसियों के जरिए केंद्र सरकार को रही ही होगी। लेकिन तब तो केंद्र सरकार ने मधु कोड़ा के खिलाफ कोई कदम उठाया नहीं। उनके ठिकानों पर छापे भी नहीं मारे गए। लेकिन जैसे ही झारखंड में चुनावों का ऐलान हुआ- मधु कोड़ा अचानक ही केंद्र सरकार की नजर में इतने बड़े खलनायक बन गए कि उनके खिलाफ जांच में केंद्र सरकार को इंटरपोल की मदद लेनी पड़ रही है। इन विधायकों की अकूत कमाई के जो राज खुल रहे हैं, वे चौंकाने वाले हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि जो मधु कोड़ा आज झारखंड के अब तक के सबसे बड़े घोटाले और निर्मम अवैध कमाई के चलते खलनायक बन चुके हैं, अब तक उनकी 1450 करोड़ की कमाई का पता चल चुका है, उसमें क्या कांग्रेस की कोई भूमिका नहीं है। कांग्रेस गांधी जी के बताए रास्ते पर चलने का दावा करती है। गांधी जी ने कहा था कि अन्याय करने से ज्यादा अन्याय सहने वाला भी होता है। पता नहीं कांग्रेस ने अन्याय सहा या नहीं या फिर उसके विधायकों ने कोड़ा न्याय में हिस्सेदारी की या नहीं...लेकिन ये सच जरूर है कि इस भ्रष्टाचार में वह भी बराबर की भागीदार है। क्योंकि सांप्रदायिकता को सत्ता से दूर रखने के नाम पर अपने 11 विधायकों के सहयोग से उसने मधु कोड़ा की 2007 में सरकार बनवाई थी। इतना ही नहीं, उसने अपने विधायक आलमगीर को विधानसभा का अध्यक्ष भी बनवाया। सरकार की वह महत्वपूर्ण सहयोगी रही है। यह कौन भरोसा करेगा कि राज्य सरकार के आठ हजार करोड़ के बजट में से चार हजार करोड़ का घोटाला होता रहे। इतना बड़ा घोटाला कि राज्य के टटपूंजिए ठेकेदार और पत्रकार तक मालामाल होते रहे और सरकार की महत्वपूर्ण सहयोगी को पता तक नहीं चल पाया। शायद पंजाब के बाद ये झारखंड पहला राज्य है, जिसके राज्यपाल और उनके दफ्तर तक पर खुलेआम भ्रष्टाचार का आरोप लगा। तब कांग्रेस या केंद्र सरकार ने चुप्पी साधे रखी। उसे अपने राजधर्म के निर्वाह की याद नहीं आई।
झारखंड में चुनावी बिगुल बज चुका है। लोकसभा चुनावों को बीते अभी छह महीने भी नहीं बीते हैं। तब भारतीय जनता पार्टी ने इस राज्य में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई थी। केंद्रीय सरकार की अगुआई कर रही कांग्रेस को पता है कि भाजपा को जनसमर्थन का वह उफान अभी कम नहीं हुआ है। हरियाणा, महाराष्ट्र और अरूणाचल प्रदेश में कांग्रेस ने सत्ता की सीढ़ी को एक बार फिर पार कर लिया है, लेकिन झारखंड में एक बार फिर इन तीनों राज्यों का इतिहास दोहराया जाता नहीं दिख रहा है। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी कांग्रेस को हिंदी पट्टी में जिंदा करने के अभियान में शिद्दत से जुटे हुए हैं। उनकी कोशिशों का फायदा पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में तो दिखा, लेकिन बिहार और झारखंड की धरती पर उनकी कोशिशें कामयाब होती नहीं दिख रही हैं। ऐसे में सत्ता की ताकत का सहारा लिया जा रहा है और ऐन चुनावों के वक्त ही मधु कोड़ा, एनोस एक्का और हरिनारायण सिंह समेत भ्रष्ट पूर्व मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ छापेमारी का अभियान शुरू कर दिया गया है।
इस पूरी कवायद का मकसद जितना झारखंड की भ्रष्टाचार मुक्त करना नहीं है, उससे कहीं ज्यादा राज्य की चुनावी बयार में फायदा उठाना है। अगर ऐसा नहीं होता तो केंद्र की ओर से इस भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए पहले से ही प्रयास किए जा रहे होते। मधु कोड़ा के भ्रष्टाचार के किस्से तो रांची के सियासी गलियारों से लेकर राजधानी दिल्ली के राजनीतिक चौराहों तक चटखारे लेकर सुनाए जा रहे थे। आम लोगों तक को पता था कि प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर झारखंड की माटी का किस कदर दोहन हो रहा है। पत्रकारीय गलियारे भी इन चटखारों से भरे पड़े थे। तब किसी सरकारी एजेंसी या जिम्मेदार विभाग को इसके खिलाफ कार्रवाई करने की क्यों नहीं सूझी।
मधु कोड़ा हों या एनोस एक्का, उनके पास इतनी सियासी ताकत और कौशल नहीं है कि वे अपने पर हो रहे सरकारी अमले की छापेमारी को भी खुद के पक्ष में साबित कर दें। देश के दलित और पिछड़े वर्ग के कई नेताओं ने अपने खिलाफ छापेमारी और सरकारी कार्रवाई को पूरी कुशलता के साथ अपने वोटरों के खिलाफ भावनात्मक तौर पर उभारने में कामयाब होते रहे हैं। लेकिन झारखंड में ऐसा होता नहीं दिख रहा है। कांग्रेस को झारखंड के इन नेताओं की इस कमजोरी की पूरी जानकारी है। शायद यही वजह है कि कांग्रेस इसका भी चुनावी फायदा उठाने की तैयारी में है।
सन 2000 में जब छोटे राज्यों का गठन हुआ था तो उसकी सबसे बड़ी वजह ये बताई गई थी कि राजनीतिक आकाओं की उपेक्षा के चलते उस खास क्षेत्र का वह विकास नहीं हुआ, जिसके वे हकदार थे। तब तर्क दिया गया कि छोटे राज्यों की कमान उनके अपने बीच के नेताओं के हाथ होगी और वे अपनी माटी और अपने लोगों की समस्याओं को ध्यान में रखकर इलाके का समुचित विकास करेंगे। लेकिन दुर्भाग्य ये कि छोटे होने बाद ये राज्य भ्रष्टाचार के और बड़े भंवर में फंस गए। रही-सही कसर छोटे-छोटे ग्रुपों की राजनीतिक और चुनावी सफलता ने पूरी कर दी। झारखंड इस गिरावट का बेहतर उदाहरण बन गया है। उससे भी बड़ा दुर्भाग्य ये कि इस गिरावट में राष्ट्रीय पार्टियां - रहा किनारे बैठ - की तर्ज पर भागीदार रहीं। इससे भी बड़े दुर्भाग्य की बात ये कि भ्रष्टाचार पर रोक लगाने की असल वजह टैक्स चुकाने वाली माटी के असल हकदार लोगों को फायदा पहुंचाना नहीं रहा, बल्कि इसका भी इस्तेमाल सियासी फायदे के लिए किया जा रहा है। ये बात नंगी आंखों से सबको नजर आ रही है। इससे बड़े दुर्भाग्य की बात और क्या होगी कि झारखंड के भूखे-नंगे मूल निवासियों के हितों की बात दिल से कोई नहीं कर रहा है। यहां के माटी पुत्रों को आज भी छोटी नौकरियों के लिए बाहर जाना पड़ रहा है। दिल्ली- मुंबई की घरेलू नौकरानियों के तौर पर झारखंड की बच्चियों को अपने दिन काटने पड़ रहे हैं। आए दिन उनसे यौन दुर्व्यहार की खबरें महानगरीय अखबारों की सुर्खियां बनती रहती हैं। साफ है इसके लिए जिम्मेदार मधु कोड़ा, एनोस एक्का और हरिनारायण जैसे राजनेता ही हैं। वहीं उनका साथ देने के चलते शिबू सोरेन, कांग्रेस और आरजेडी भी इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। ऐसा नहीं कि इस कुचक्र को झारखंड की जनता-जनार्दन नहीं समझ पाई है। देखना ये है कि वह चुनावी बयार में इसका हिसाब नेताओं से चुका पाती है या नहीं।

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