Thursday, August 6, 2009

बाबूजी नहीं आएंगे दिल्ली


उमेश चतुर्वेदी
दक्षिण पूर्वी मानसून महाराज ने दगा दे दी है। वर्षारानी के इंतजार में आंखें पथरा गईं हैं। कभी-कभार हो रही हल्की फुहारों से ही सब्र करना पड़ रहा है। खेती का काम चौपट हो गया है। लिहाजा इस बार गांव में काम कम ही रह गया है। बारिश की खुशखबरी के लिए गंवई मन फोन किए बिना नहीं रहता। लेकिन रोज निराशा ही हाथ लगती है। मानसून नहीं तो खेती नहीं...लिहाजा एक दिन बाबू जी को दिल्ली आने के लिए इसरार कर बैठा। दिल्ली की भागमभाग के बीच गांव कहीं पीछे छूट गया है। अगर कहीं है भी तो सिर्फ मन में..रोज घर लौटते वक्त गांव को जीने की इच्छा बलवती हो उठती है। मन ही मन रोजाना योजनाएं बनती हैं..कि कुछ ऐसा किया जाय को महीना-दो महीना में गांव का चक्कर लग ही जाए। लेकिन अगले दिन सूरज की किरणों के साथ जैसे अंधेरा गायब हो जाता है, गांव को जीने की ये लालसा फुर्र हो जाती है और नून-तेल की चिंता में शुरू हो जाती है एक अंतहीन दौ़ड़..लेकिन मन तो ठहरा गंवई...अंतर्मन में शायद माई और बाबूजी के ही बहाने गांव को जी लेने की इच्छा कहीं दबी हुई है। लिहाजा मैं बाबूजी और माई पर दिल्ली आने के लिए जोर डालने लगा। मोबाइल फोन के उस पार से आ रही आवाज से लगा कि मां हम लोगों से मिलने के लिए उत्सुक तो है...लेकिन बाबूजी की आवाज ठंडी और टाल-मटोल वाली लगी।
इसके साथ ही मुझे बाबूजी की पिछली दिल्ली यात्रा की याद आ गई। आंख का इलाज कराने के लिए उन्हें दिल्ली लाया गया था। यहां के आकर पता चला कि उन्हें सेहत से जुड़ी कई और समस्याएं भी हैं। लिहाजा उनका लंबा इलाज चला। चूंकि इलाज लंबा था, इसलिए उन्हें यहां देर तक ठहरना पड़ा। सुबह तो जैसे उनकी ताजगी में अखबार और चाय के साथ उत्फुल्लता से कट जाती। लेकिन शाम होते ही वे कुछ असहज हो जाते। लगता, वे उदास हैं और अपनी उदासी छुपाने की कोशिश करते वे प्रतीत होते। मैं उनकी परेशानी समझता था। पूरी जिंदगी अध्यापक के तौर पर गांव में गुजार चुके बाबूजी का अपना वहां भरा-पूरा समाज है। शाम को काम से फारिग होने के बाद वे अपने दोस्तों के साथ अड्डेबाजी में जुट जाते हैं। उनके दोस्तों में हर जाति के लोग हैं। ब्राह्मणत्व को किनारे रख कर अड्डेबाजी करने के लिए उनकी अपनी बिरादरी में आलोचना भी होती रही है। लेकिन वे कभी अपने दोस्तों से दूर नहीं हुए। लेकिन दिल्ली में वह समाज मिलने से रहा। फ्लैटों के बंद दरवाजे के पीछे टेलीविजन के सहारे चलती जिंदगी उन्हें रास नहीं आई। मुझे याद है जिस दिन वे दिल्ली से गांव लौटे तो उन्होंने पीछे मुड़कर देखना भी गवारा नहीं हुआ। उनका जाना ऐसे प्रतीत हो रहा था, मानो लंबी यातना से छूटा कैदी भाग रहा हो ।
हमारा दावा है कि आने वाले दिनों में शहरी आबादी में तेजी से विस्तार होगा। आजादी के बाद तकरीबन अस्सी फीसदी अपनी आबादी गांवों में रहती थी। अब ये आंकड़ा 67 के नजदीक पहुंच गया है। सच है कि गांवों के मुकाबले शहरों में जिंदगी गुजारने के लिए तमाम तरह की सुविधाएं हासिल हैं। इसके बावजूद एक पूरी की पूरी पीढ़ी ऐसी है, जिसे ये सुविधाएं नहीं लुभा पातीं। कवि शमशेर के शब्दों में कहें तो वह पीढ़ी गाती फिरती है-
अच्छी अपनी ठाठ फकीरी, मंगनी के सुखसाज से। शहर में सुखसाज तो है, लेकिन ठाठ नहीं है और मानवीयता और रिश्तों की उष्मा का तो खैर कम ही दर्शन होता है। मानव ही क्यों, जानवर भी अगर अपना समाज बनाता है तो उसमें इस उष्मा का ही बड़ा योगदान होता है। बाबूजी जैसे लोगों की पीढ़ी ने अपनी पूरी जिंदगी इसी उष्मा के सहारे गुजारी है। लिहाजा उन्हें जीवन की सांध्य बेला में सुखसाज से ज्यादा ठाठफकीरी में लिपटा अपना जीवंत समुदाय ही ज्यादा मुफीद लगता है। लिहाजा उनके लिए अपना गांव छोड़ना और दिल्ली में रहना...नरक भोगने जैसा है। इसीलिए वे दिल्ली या मुंबई का रूख करने से बचते हैं।
हमने अपने गांव में देखा है। एक दंपत्ति के सभी बच्चे उंची तालीम हासिल कर मोटी पगार और रसूख वाली नौकरियों में चले गए। सभी बच्चे माता-पिता को जोर देकर गांव से अपने साथ ले जाते रहे, लेकिन माता-पिता साल-छह महीने बाद लौटते रहे। उनके लिए गांव छोड़ना अपनी माटी से दगाबाजी करने जैसा रहा। हमारे एक और मित्र हैं। उनकी मां का देहांत हो गया है। प्रोफेसर पिता रिटायर हो गए हैं। मित्र अपने भाई के साथ दिल्ली में अच्छी तरह सेटल हैं। लेकिन उनकी रोजाना की सांझ पिता की चिंता में ही गुजरती है। क्योंकि पिता भी दिल के मरीज हैं। लेकिन पिता हैं कि दिल्ली रहने को तैयार नहीं। जोर देने पर दिल्ली आते हैं तो दस – पंद्रह दिन में ही उबकर वापस लौट जाते हैं।
आजादी के आंदोलन या नेहरू के स्वप्नवादी दौर में पैदा हुई इस पीढ़ी के ही सहारे गांवों का वजूद बचा हुआ है। जहां तमाम पेंचीदगियों के बावजूद जिंदगी की एक धार अब भी बह रही है। दुर्भाग्य ये कि अब ये पीढ़ी अपनी विदाई की बेला में है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि हमारे जैसे लोग क्या दिल्ली या मुंबई की कथित जिंदगी को कभी अपनी इस पूर्ववर्ती पीढ़ी की तरह निर्ममता पूर्वक छोड़ पाएंगे। या फिर जिंदगी की धार में डूबने का सिर्फ सपना ही देखते रह जाएंगे।

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