Monday, July 20, 2009

डंडे का धंधा


उमेश चतुर्वेदी
बुढ़ापे का सहारा, विकलांगों का साथी रही छड़ी का धंधा तो हम में से शायद ही कोई होगा, जिसने नहीं देखा होगा। लेकिन डंडे का धंधा...पहली बार सुनकर आपको हैरत होनी स्वाभाविक है। लेकिन हमने तो डंडे का धंधा जब अपनी नंगी आंखों से देखा तो हमें कितनी हैरानी हुई होगी, इसका अंदाजा लगाना आसान होगा। डंडे के इस धंधे से हमारा साबका पड़ा शिमला की जाखू पहाड़ियों पर विराजमान हनुमान मंदिर पर। सैलानियों की पसंदीदा जगहों पर स्थित मंदिरों पर जाते ही सबसे पहले साबका पड़ता है प्रसाद और पूजा की सामग्री बेचने वाले लपका किस्म के दुकानदारों से। पूरे शहर में प्रसाद और पूजा की सामग्री भले ही सस्ती होगी, लेकिन क्या मजाल कि मंदिर के ठीक दरवाजे पर स्थित इन दुकानों पर पूजा का सामान सस्ता मिले। लेकिन जाखू मंदिर पर दूसरी हैरत हमारा इंतजार कर रही थी। यहां वैसी महंगाई नजर नहीं आई, जिसके हम दूसरे तीर्थस्थलों पर आदी रहे हैं।
लेकिन यहां प्रसाद बेचते वक्त दुकानदार पास पड़े बेंत के तीन से पांच फीट लंबे डंडे के ढेर की ओर इशारा करना नहीं भूलता था। चूंकि किसी तीर्थ स्थल पर पूजा सामग्री के साथ पहली बार डंडा बिकते देखा तो हमने पहले तो कोई टोटका सोचा। हमें लगा कि शायद यहां हनुमान जी को डंडा भी चढ़ाया जाता होगा। लेकिन हमारा ऐसे टोटकों में कोई भरोसा नहीं रहा, लिहाजा हमने डंडा खरीदने से मना कर दिया। लेकिन प्रसाद लेकर जैसे ही हमने मंदिर की चढ़ाई की ओर पहला कदम रखा, हमें डंडे की वकत और जरूरत समझ में आ गई। हनुमान जी का मंदिर हो और बंदरों की फौज वहां ना हो, ऐसा आपने कहीं नहीं देखा होगा। तो जाखू भला इससे कैसे दूर रहता। बंदरों की फौज ने हमें घेर लिया। कई तो दो-दो पैरों पर खड़े होकर हमारे हाथ में लटके थैले की ओर लपक पड़े। डर के मारे मेरी छोटी बेटी मुझसे चिपक गई तो बड़ी श्रीमती जी का हाथ थामे आगे बढ़ने लगी। इसी बीच एक बंदर ने झपट्टा मारा और पॉलिथीन के बैग का हत्था ही श्रीमती जी के हाथ में रह गया, बाकी पूरा बैग हनुमान जी के जीते-जागते गणों के हाथ। डर के मारे बच्चे चिल्लाने लगे। इसके बाद तो मैंने सारी श्रद्धा एक किनारे रखी और मेरा गंवई अनुभव बंदरों पर पिल पड़ा। मेरे हाथ में लकड़ी का एक गिफ्ट आइटम था। उसके ही आगे बंदरों की फौज भाग खड़ी हुई। अभी हम इनसे निबटे ही थे कि आगे चल रहे एक दंपति की चीख-पुकार ने वहां फैली शांति में खलल डाल दी। दरअसल उस ग्रुप की महिला की आंखों से चश्मा ही बंदर महाराज छीन ले गए। इस दौरान महिला की आंख में बंदर का नाखून चुभते रह गया। हालांकि चेहरा लहू-लुहान जरूर हो उठा था।
बाद में मंदिर से लौटने के बाद पता चला कि प्रसाद के साथ बिक रहा डंडा दरअसल हनुमान जी को चढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि उनके आक्रामक हो चुके गणों को दूर रखने में मदद करता है। जो ज्यादा चालाकी दिखाने की कोशिश करता है, उसके आंख से चश्मा गायब हो जाता है या फिर हाथ से बैग। मंदिर प्रशासन इन बंदरों को भगाने के लिए कोई मुकम्मल इंतजाम नहीं करता। उसने जगह – जगह बंदरों को खाना ना देने और सावधान रहने की चेतावनी देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है। लिहाजा डंडे का धंधा पूरी शिद्दत से जारी है। आप अगर डंडा खरीदना ना चाहें तो आपको दुकानदार किराए पर भी डंडा दे सकता है। किराया भी महज पांच रूपए। शिमला की पहाड़ियों पर स्थित इस हनुमान की दूर-दूर तक प्रसिद्धि इसलिए है, क्योंकि कहा जाता है कि लक्ष्मण को बचाने के लिए संजीवनी बूटी लाते वक्त हनुमान जी कुछ देर तक यहां सुस्ताने के लिए रूके थे। जाहिर है यहां सैलानियों की भारी भीड़ रोजाना जुटती है। ऐसे में आप अंदाजा लगा सकते हैं कि डंडे का ये धंधा कितनी बड़ी कमाई का स्रोत बन पड़ा है।
यूं तो बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग डंडे के धंधे के लिए बदनाम रहे हैं। लेकिन उनका धंधा डंडा बेचने की बजाय डंडे के दम पर काम कराना या काम निकालना रहा है। पिछले कुछ वक्त से महाराष्ट्र में यही काम राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना कर रही है। लेकिन उनका डंडे का धंधा सीधे पैसे कमाने के लिए नहीं , बल्कि वोटों की फसल काटने के लिए है। एक बार वोटों की फसल तैयार हो गई तो पैसे की भला कहां कमी रहती है। पिछले आम चुनावों में शिवसेना - बीजेपी के वोट बैंक में जिस तरह सेंध लगाई, उससे साफ है कि राज ठाकरे का धंधा कामयाब रहा। वैसे एक मुहावरा भी प्रचलन में है – डंडे के दम पर काम कराना। ये मुहावरा चलन में इतना है कि बंदूक और पिस्तौल के दम पर अच्छा चाहे बुरा, जैसा भी काम कराएं, कहा तो यही जाता है कि डंडे के दम पर काम हुआ। सही मायने में ये भी डंडे का धंधा ही है। ये बात और है कि जाखू में डंडे का धंधा, बाकी जगहों के व्यवसाय से तो अलग है ही।

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