Monday, March 30, 2009

ख्याल रहे कि,रोशनी में कुछ घर भी जल रहे हैं

अंजनी राय हैं तो वैसे एमबीए पास, लेकिन प्रबंधन का काम मीडिया हाउसों में करते रहे हैं। फिलहाल जर्मनी में हैं और वहीं से उन्होंने भारत में जारी मौजूदा चुनावों को लेकर अपनी प्रतिक्रिया भेजी है। पेश है उनका नजरिया-
चुनाव आयोग की ओर से तारीखों की घोषणा के साथ ही पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव पूरे शबाब पर हैं.... सभी पार्टियां अपने झंडे और डंडे लेकर मैदान में उतर गई हैं। चुनावी समर में जीत हर हाल में जरुरी हैं ... और जनता को रिझाने का कोई भी मौका नेता छोड़ना नहीं चाहते..... चुनाव आचार संहिता को ताक पर रखकर कहीं वादों की पोटली खोली जा रही है... तो कहीं भड़काऊं भाषण दिए जा रहे है..... नोट के जरिए वोट बटोरने वालों की भी यहां कोई कमी नहीं...... कोई नजराने के नाम पर पैसा लुटा रहा है... तो कोई त्यौहार और परंपराओं की दुहाई देकर लोगों की जेब मोटी कर रहा है......... मसकद साफ है..... लोकतंत्र के महापर्व में किसी भी तरह जनता का प्रसाद हासिल करना........ लेकिन एक बात चौंकाने वाली है कि किसी भी पार्टी ने अब तक उस मुद्दे को उतनी मजबूती से नहीं उठाया है जिसमें पूरी दुनिया पीस रही है.....यही नहीं इसकी भयावहता के छिंटे भारत पर भी पड़े हैं...... मुद्दा है आर्थिक मंदी का........ जिसने पूरी दुनिया को अपने शिकंजे में ले लिया है..... लेकिन हैरानी की बात कि इसमें कोई भी पार्टी अपना हाथ नहीं डालना चाहती........

आर्थिक मंदी के दुष्परिणाम अमेरिका और युरोपीय देशों में साफ देखा जा सकता है....... जर्मनी जैसे विकसित देश में कई संस्थाओं में देखते ही देखते ताले लग गये.... लाखों लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा.......ये तो बात रही विकसित देशों की...... भारत जैसे विकासशील और तीसरी दुनिया के देशों का तो और भी बुरा हाल है...... बावजूद इसके यहां कोई भी राजनैतिक दल सच्चाई से रू-ब-रू होना नही चाहता........ ज्यादा दुःख तो तब होता है जब नेता सदन की सीढ़ीयां चढ़ने के लिए समाज में जातिगत विद्वेष और मजहबी उन्माद का बीज बोते हैं.......
वरुण गांधी के मसले को ही ले लें..... हजारों लोगों के बीच कुछ उतेजक बयान ने..... अचानक वरुण को एक वर्ग विशेष को लोगों के बीच हीरो बना दिया है..... वरुण के मुंह ने निकले चंद जहरीले शब्द समाज में किस तरह का जहर घोल सकते हैं इस बात कि किसी को परवाह नहीं...... बीजेपी जहां वरुण के सहारे यूपी में खोते जा रहे अपने हिंदुत्व वोट को फिर से तुनीर में डालने की कोशिश कर रही हैं वहीं कांग्रेस को चिंता है कि अक्रामक वरुण कहीं अपने तीखे तेवर से उनके युवराज राहुल को हाशिये पर न धकेल दे........ सो कांग्रेस वरुण को साम्प्रदायिक ठहराने पर तुली हुई है..... इस बात की चिंता किए बगैर की कई राज्यों में उसने ऐसे दलों से गठबंधन करने में गुरेज नहीं किया है जो अल्पसंख्यक हितों के नाम पर ही सही एक सम्प्रदाय विशेष की बात करने में कभी नहीं गुरेज करते.......सवाल है कि राजनीतिक दलों को समुह विशेष की चिंता चुनाव के वक्त ही क्यों होता है..... क्या वे इस तरह की राजनीति कर एक धर्मनिरपेक्ष देश की आत्मा को तार तार नहीं कर रहे हैं..........

मकसद साफ है ये कर्मयुद्द है और इसमे जीत के लिए धर्म और इंसानियत की बलि भी देनी पड़े तो राजनेताओं को इसका कोई परवाह नहीं..........कभी कभी तो हंसी आती है इन खदरधारियों की कुर्सी के प्रति आसक्ति को सुनकर........ पूर्व रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडिस अपने उम्र के आखिरी पड़ाव पर है..... शरीर साथ नहीं दे रहा है बावजूद इसके चुनाव लड़ने से गुरेज नहीं है.... खुद को तो संभाल नहीं पा रहे हैं चुनाव जीतकर वे कौन सा देश को संभाल लेंगे.......

इस वेब पोर्टल के माध्यम से हमारा सभी राजनीतिक दलों से अनुरोध हैं कि आपसी रंजिश भुलकर सभी दल देश के बारे में सोचें.......... एक अरब दस करोड़ आंखों में आपसे कई उम्मीदे हैं.........

खूब जोर से पटाखे जलाओ यारो
बस इतना ख्याल रहे कि
रोशनी में कुछ घर भी जल रहे हैं

No comments:

Post a Comment

My Perspective: Futile Use of Political Power: Vijay Sanghvi

My Perspective: Futile Use of Political Power: Vijay Sanghvi Sages have said for ages that political power and morality cannot walk toge...