Tuesday, March 4, 2008

दहशत के साए में फसल

उमेश चतुर्वेदी
आपने शायद ही सुना होगा कि बुवाई के वक्त खेत का मालिकाना हक किसी और के पास होता है और जब फसल तैयार हो जाती है तो उसे काटने के लिए कोई और पहुंच जाता है। इसके लिए उसे खून की नदी बहाने से भी कोई गुरेज नहीं होता। सुनने-पढ़ने में ये हमें भले ही अचरजभरा लगे- लेकिन उत्तर प्रदेश – बिहार सीमा पर हर साल रबी के मौसम में ऐसा ही होता है। दोनों राज्यों के बीच जारी सीमा विवाद इसकी अहम वजह है।
गंगा किनारे पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया और आरा जिले की सीमा पर हासनगर दियारे में इस साल भी सीमा विवाद को लेकर गोलियां तड़तड़ाने का दौर जारी है। फरवरी के पहले हफ्ते में इलाके के गांव गायघाट के किसान खेत नापी का काम कर रहे थे। इसी बीच बिहार के दबंग किसान भी वहां पहुंच गए। दोनों के बीच कहासुनी होने लगी। मामला तूल पकड़ते देर नहीं लगा और दोनों तरफ के किसान आमने-सामने हो गए। दोनों तरफ के किसानों के बीच खेतों पर हक को लेकर तू-तू-मैं-मैं के बाद तकरीबन हर हफ्ते गोलियां बरसाने का दौर चल रहा है। दरअसल इस इलाके के 39 गांवों की 7062 एकड़ जमीन विवादित है। उत्तर प्रदेश के किसान इसे अपना बताते हैं – तो बिहार की तरफ के लोगों का कहना है कि ये जमीन उनकी है। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि गंगा किनारे जलोढ़ मिट्टी वाले इन खेतों में असल विवाद कटाई के दौरान होता है। बुवाई के वक्त खेतों पर मालिकाना हक के लिए दोनों तरफ से कम ही विवाद होता है। लेकिन शायद ही कोई साल हो – जब फसल कटाई के दौरान गोलियां नहीं चलतीं। हर साल कई लोग इस खूनी विवाद की भेंट चढ़ जाते हैं। लेकिन ना तो उत्तर प्रदेश और बिहार की राज्य सरकारें – और ना ही केंद्र सरकार इस मसले पर कोई कारगर कदम उठाती है। ताकि इस खूनी संघर्ष को रोका जा सके।
दरअसल उत्तर प्रदेश के बलिया और बिहार के छपरा,आरा, बक्सर और सीवान जिले के 153 गांवों की करीब 65 हजार एकड़ जमीन आज भी सीमा विवाद में उलझी हुई है। सीवान को छोड़ दें तो बाकी जिलों और बलिया के बीच बहती गंगा नदी इस विवाद की असल जड़ है। यह विवाद 150 साल से भी ज्यादा पुराना है। इसमें बिहार के 114 गांवों की 44177.55 एकड़ और उत्तर प्रदेश के 39 गांवों की 20174.77 एकड़ जमीन को लेकर विवाद है। लेकिन खूनी संघर्ष करीब 7062 एकड़ के लिए ही ज्यादा होता रहा है। इसे लेकर साल दर साल सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है। इसी खूनी संघर्ष से बौखलाई केंद्र सरकार ने साल 1962 में प्रशासनिक सेवा के अधिकारी सी एम त्रिवेदी की अध्यक्षता में एक जांच समिति बनाई थी। जिसने 1964 में अपनी रिपोर्ट पेश कर दी थी। उसी एक्ट के बाद संसद ने बिहार-यूपी ऑल्टरेशन ऑफ बाउंड्री एक्ट 1968 पारित किया। अपनी सिफारिश में त्रिवेदी समिति ने दोनों राज्यों के वर्ष 1879 से 1883 के गांवों की यथास्थिति बनाए रखने पर जोर दिया था। लेकिन अचरज की बात ये है कि संसद के इस कानून बनाए जाने के बावजूद दोनों तरफ की सरकारों और केंद्र ने इसे लागू नहीं किया। यही वजह है कि बलिया-आरा सीमा पर स्थित नैनीजोर दियारे में हर साल रबी के मौसम में कटाई के वक्त खून की होली खेली जाती है। हालांकि अपने किसानों की हिफाजत के लिए दोनों तरफ की सरकारें सुरक्षा बलों को तैनात करती हैं। दोनों तरफ का प्रशासन अपने किसानों के पक्ष में मुस्तैद भी रहता है। साल 1993 में तो उत्तर प्रदेश की पीएसी ने आरा के डीएम पर ही गोली चला दी थी। तब आरा के जिलाधिकारी फसल कटाई में अपने किसानों की सहायता में गंगा के दक्षिणी किनारे तक खुद आ गए थे। बक्सर के विधायक रहे स्वामीनाथ तिवारी के एक ऐसी ही कोशिश पर पीएसी ने गोली चला दी थी। दो साल पहले बिहार के दबंग किसानों ने उत्तर प्रदेश के 11 किसानों को बंधक बना लिया था। वैसे अब तक का इतिहास रहा है कि इस विवाद में सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश की तरफ के किसानों को ही उठाना पड़ा है।
इस जमीनी विवाद को बढ़ाने और हिंसक गतिविधियों को अंजाम देने में इस जमीन के उपजाऊपन की ज्यादा विशेषता है। इस इलाके में अगर गंगा में बाढ़ आ गई तो बिना खाद – पानी के गेहूं-चना-मसूर के साथ ही परवल, तरबूज और दूसरी सब्जियों की भरपूर पैदावार होती है। हिंदुस्तान का सबसे बेहतरीन परवल इसी इलाके में पैदा होता है और इसकी सप्लाई पूरे देश में होती है। हर साल करोड़ों की कमाई तो सिर्फ परवल के निर्यात से ही हो रही है। जमीनी विवाद के साथ ही परवल की भारी कमाई के चलते हर साल परवल किसानों को बदमाशों का भी शिकार बनना पड़ रहा है और इलाकाई किसान इस दहशत में जीने और रोजी-रोटी चलाने के लिए मजबूर हैं। रही-सही कसर सीमा विवाद पूरा कर देता है।
ऐसा नहीं कि इस मसले को सुलझाया नहीं जा सकता। अगर दोनों तरफ की सरकारें चाहें तो दोनों तरफ के लोगों को साथ बैठाकर इस समस्या का समाधान खोजा जा सकता है। बाहरी लोगों को जानकर ये ताज्जुब होगा कि सीमा विवाद और गोलियों की गड़गड़ाहट के बावजूद दोनों तरफ के लोगों के बीच रोटी और बेटी का रिश्ता भी बदस्तूर जारी है। लेकिन फसलों को लेकर हर साल दोनों तरफ के दो-चार लोगों को जान गंवानी पड़ रही है। कोई कारण नहीं कि मायावती और नीतीश कुमार मिलकर इस समस्या का समाधान ना निकाल सकें। लेकिन लाख टके का सवाल ये है कि पहल कौन करे।

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